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यूरोप की गलियों में मोहब्बत

अध्याय 1 – पहली मुलाक़ात

वसंत की शुरुआत थी, जगह थी इटली का फ़्लोरेंस। संकरी कंकरीली गलियों में ताज़ा बेक हुई ब्रेड की ख़ुशबू तैर रही थी और दूर किसी चौक से वायलिन की मधुर धुन गूंज रही थी।
लंदन से आई एमा अपने हाथ में कैमरा लिए गलियों में घूम रही थी, हर एक नज़ारे को कैद करती हुई, मानो यूरोप की हर सुंदरता को अपनी यादों में बुन लेना चाहती हो।

जब वह पोंटे वेक्चियो पुल के पास पहुँची और नदी में पड़ती सुनहरी छवि को अपनी डायरी में स्केच करने लगी, तभी एक कोमल सी आवाज़ ने उसके विचारों की लय तोड़ी।

“बहुत ख़ूबसूरत नज़ारा है, है ना?”

एमा ने मुड़कर देखा। सामने खड़ा था लुका—रोम का एक युवा आर्किटेक्ट। उसकी मुस्कान गर्मजोशी भरी थी, लहज़ा सहज, पर उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जिसने एमा को पल भर में अपनी ओर खींच लिया।

एमा ने हल्की हंसी में जवाब दिया—“हां, बिल्कुल। लेकिन तुम इटालियनों के लिए तो ये रोज़ का नज़ारा है। क्या तुम्हें कभी ये सब साधारण नहीं लगता?”

लुका ने मुस्कुराकर कहा—“कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिनकी आदत कभी नहीं लगती। जैसे ख़ूबसूरती… या तक़दीर।”

बस यही एक वाक्य दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता बुन गया। उसके बाद का समय मानो पिघल गया—कॉफ़ी के प्यालों पर लंबी बातें, पुरानी गलियों में टहलना, और धूप में चुराई हुई नज़रों का आदान-प्रदान।

रात ढलते-ढलते फ़्लोरेंस सिर्फ़ एक जगह नहीं रहा, बल्कि उनकी साझा कहानी का पहला अध्याय बन गया। जब वे उस शाम जुदा हुए, तो दोनों के बीच एक अनकहा वादा रह गया—यह अंत नहीं, बल्कि उनकी तक़दीर की किताब का पहला पन्ना है।

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